मास्‍क उतरते ही कांप गई मासूम: नजारा देख सुप्रीम कोर्ट ने मेडिकल सबूत भी कर दिए दरकिनार, जेल में ही सड़ेगा दरिंदा

Supreme Court: चार साल की मासूम ने कोर्ट में जैसे ही आरोपी को बिना मास्‍क देखा, उसके कांपते पैर और फूट-फूटकर रोने की आवाज ने सुप्रीम कोर्ट को झकझोर दिया. अदालत ने इसे बच्‍ची के भीतर छिपे गहरे सदमे का सबूत मानते हुए आरोपी की माफी याचिका ठुकरा दी. दोष बरकरार रखा. हालांकि दोषी को कुछ राहत जरूर दी गई.

नई दिल्‍ली. वह मासूम अभी बोल भी ढंग से नहीं पाती थी, लेकिन उसकी आंखों में दर्ज दर्द ने अदालत को झकझोर दिया. चार साल की उस बच्ची ने जैसे ही कोर्ट में आरोपी को बिना मास्क देखा, उसके पैर कांपने लगे, चेहरा सफेद पड़ गया और वह जोर-जोर से रोने लगी. वह पल सुप्रीम कोर्ट के लिए एक सबूत नहीं, बल्कि एक गवाही थी जो चीख-चीखकर बता रही थी कि बच्‍ची के साथ क्‍या कुछ हुआ. सुप्रीम कोर्ट ने इसी भावनात्मक क्षण को आरोपी की दोषसिद्धि का सबसे बड़ा आधार मानते हुए कहा कि “यह व्यवहार उसके मन में भरे भय और गहरे सदमे का प्रमाण है.” अदालत ने उसकी माफी की अर्जी को ठुकरा दिया. हालांकि उसकी सज़ा को सात से घटाकर छह साल कर दिया,

मां को देख भाग निकला था दरिंदा
घटना 15 अगस्त 2021 की है. स्वतंत्रता दिवस की शाम, जब ज्यादातर घरों में परिवार साथ बैठा जश्न मना रहे थे, उसी समय एक मां ने अपनी बच्ची को दर्द से तड़पते देखा. आरोपी आधी पैंट में उसके पास बैठा था और बच्ची रोते हुए बार-बार निजी हिस्से में दर्द की शिकायत कर रही थी. बच्ची के कपड़े अस्त-व्यस्त थे और आरोपी वहां से भाग निकला. यह दृश्य किसी भी मां के दिल में आग लगा सकता था. पीड़िता की मां और पिता ने अदालत में जिस तरह लगातार और साफ-साफ गवाही दी, उसने पूरा सच सामने ला दिया.

मेडिकल रिपोट में प्राइवेट पार्ट पर नहीं थी गंभीर चोट
मेडिकल रिपोर्ट में भले ही गंभीर चोटें नहीं थीं, लेकिन सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति एन.वी. अंजारिया और न्यायमूर्ति अरविंद कुमार की बेंच ने  कहा, “जब आंखों-देखी विश्वसनीय गवाही हो, तो मेडिकल रिपोर्ट पीछे रह जाती है.” इस मामले में सबसे निर्णायक पल वह था, जब बच्ची को कोर्ट में आरोपी के सामने लाया गया. कुछ सेकंड में उसका दर्द पूरे कोर्टरूम में फैल गया. वह मुड़ गई, उसने सिर झुका लिया, रोने लगी और आरोपी की तरफ देखने से भी मना कर दिया. सुप्रीम कोर्ट ने इसे “एक चार साल की बच्ची के मन में बसे भय और आघात की प्रत्यक्ष गवाही” बताया.

‘ये सिखाया हुआ बयान नहीं हो सकता’
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ऐसी प्रतिक्रिया किसी सिखाए हुए बयान या झूठ का परिणाम नहीं हो सकती. ट्रायल कोर्ट और हाई कोर्ट ने आरोपी को POCSO एक्ट की धारा 9(m) और 10 के तहत दोषी ठहराया था. सुप्रीम कोर्ट ने भी दोषसिद्धि को सही माना, लेकिन यह देखते हुए कि आरोपी पहले ही 4 साल 5 महीने जेल में काट चुका है, सजा को 7 वर्ष से घटाकर 6 वर्ष कर दिया. जुर्माना 6,000 रुपये और भुगतान न करने पर एक वर्ष की अतिरिक्त सजा को बरकरार रखा.

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