Golu Devta

Golu Devta उत्तराखंड को देव भूमि के नाम से भी जाना जाता है , क्योकिं उत्तराखंड में कई देवी देवता वास करते है तो आज हम आपको बताने जा रहे हैं गोलू देवता (Golu Devta) के बारे में जिन्हें “न्याय का देवता” भी कहा जाता है.

गोलू देवता (Golu Devta) अपने न्याय विधान एवं सभी की कामनाओं को पूर्ण करने के कारण प्रसिद्ध है. लोग गोलू देवता (Golu Devta) के दरबार पर चिट्टियां लिखकर न्याय की कामना करते हैं. गोलू देवता (Golu Devta) कुमाऊं के इष्ट देव भी है.

Golu Devta गोलू देवता सम्पूर्ण कहानी

golu devta
गोलू देवता (Golu Devta)

श्री गोल ज्यू का वंश विवरण

यह कहानी उत्तराखंड के कुमाऊं मंडल की है इसे काली कुमाऊं भी कहा जाता है. चंपावत में कभी कत्युरो की राजधानी थी और धूमा गढ़ में राजा का किला था. वहां के राजा थे तलरायी. उन्होंने अपनी राज में कई सामाजिक कार्य किए उन्होंने रास्ते,.नौले, जल स्रोतों और धर्मशालाओं आदि का निर्माण कराया. राजा तराई बड़े धर्मात्मा थे. दीन दुखियों की सेवा करते थे. राजा तलरायी के बाद उनके घर में एक कुमार पैदा हुए जो राजा हलरायी कहलाए. फिर राजा हलरायी के घर में राजकुमार झलरायी पैदा हुए. लेकिन तीन पीढ़ियों से उनके घर में सिर्फ एक ही पुत्र पैदा होता था.

राजा झलरायी की हृदय पीड़ा एवं ग्रह वृतान्त

राजा झलरायी भी एक यशस्वी राजा थे. राजा की सात रानियां थी लेकिन फिर भी राजा बहुत दुखी थे. राजा की सातों रानियां एक से बढ़कर एक सुंदर थी लेकिन सात रानियां होने के बाद भी राजा की संतान नहीं हो पाई. जिस कारण वह काफी दुखी हो गए और कमजोर पड़ गए संसार में सबसे बड़ा दुख संतान का ही होता है. राजा ने बड़े-बड़े ब्रह्म ज्ञानियों से अनेक बार पुत्र प्राप्ति के लिए यज्ञ कराएं जिसने जैसा उपाय बताया राजा ने वैसा किया इतने उपाय करने के बाद भी वह संतान सुख नहीं भोग पा रहे थे.

एक बार एक राहगीर रास्ता भूल कर राजा के राज्य की तरफ पधारे, उन्होंने रात्रि विश्राम राजा के घर पर ही किया. वह राहगीर काशी के रहने वाले थे. उन्हें पंचांगों का अच्छा ज्ञान था. तब वह विद्वान राजा का चेहरा देखकर उनका दुख जान गए. राजा का दुख देखकर उनका भी गला भर आया.

उन्होंने सभी रानियों की कुंडली दिखाने को कहा तब उन्होंने बताया कि सातों रानियों के ग्रह बड़े कठोर है. सारे रास्ते ग्रह दोष के कारण बंद पड़े हैं. सातों रानियों के ग्रहों में खोट ही खोट है लेकिन तुम्हारी आठवीं रानी के गर्व से ध्रुव तारे के समान बालक उत्पन्न होगा और तुम्हारे मन की इच्छा पूरी होगी. शास्त्री ने जाते समय चेतावनी से कहा जब आठवीं रानी घर आएगी तभी उससे संतान उत्पन्न होगी और विवाह करने के बाद आठवीं रानी के हाथ से भैरव देवता का यज्ञ अवश्य कराना.

विद्वान की बातों को सुन राजा सोचने लगे कि चौथी अवस्था अर्थात बुढ़ापे में कौन बेवकूफ अपनी पुत्री का विवाह बूढ़े से करेगा. अब तो मृत्यु का समय भी नजदीक आ गया है. राजा अपनी आगे की पीढ़ी के लिए काफी चिंतित हो गए उन्हें पुत्र कोप काट खा रहा था. राजा झलरायी बहुत दुबले हो गए थे. नींद भी आनी उन्हें कठिन हो गई थी और सपने में बड़बड़ आते रहते थे.

राजा झलरायी अपने घर गृहस्ती को देखकर काफी दुखी हो गए थे फिर उन्हें एक दिन शिकार खेलने का विचार आया ताकि थोड़ा मन उलझनो से मुक्त हो जाए राजा शिकार के लिए जाते-जाते जंगलों में बहुत दूर चले गए जहां वह देखते हैं कि बहुत घना जंगल है जंगल के मध्य एक मैदान है. जहां हाथी के समान दो भैसे से आपस में लड़ रहे हैं ऐसा समझो कि वह दोनों में से एक दूसरे को मार देना चाहते हो.

लड़ाई को देखकर झलरायी आश्चर्यचकित हो गए और सेना को आदेश दिया कि जल्दी जाओ उनकी लड़ाई को छुड़ाओ लेकिन उनकी सेना और भैंसों की लड़ाई छुड़ा पाने में असमर्थ हुए. पूरा मैदान खून से लथपथ हो गया भैसो के सींग भी टूट गए. लेकिन लड़ाई रुकने का नाम नहीं ले रही थी.

कलिंका से वन में मिलन वृतान्त

तब राजा सेना को पानी भर कर लाने का आदेश देते हैं. राजा को चलते चलते पानी की प्यास लग गई थी. राजा कि सेना एक जलस्रोत के पास पहुंच गई. तभी वहां जल स्रोत के पास एक सुंदर कन्या बैठी हुई थी. जिसकी उम्र लगभग 16 साल होगी. ऐसी सुंदर नारी उन्होंने कभी नहीं देखी थी . तब राजा के सेनानायक सुंदरी को राजा के सामने प्रस्तुत करते हैं.

वह सुंदरी राजा झलराई के पास पहुंचते ही राजा को कोसने लगती है. बोलती है, आपने कभी भैंसों की लड़ाई नहीं देखी है. तुम पुरुष के नाम पर नपुंसक हो तुमने अपनी मां का दूध नहीं पिया है क्या? भैसे लड़ाई लड़ रही है मैदान में रक्त के तालाब बन चुके हैं. इनके युद्ध को देखकर सिहरन पैदा हो रही.

इतना कहने के पश्चात वह सुन्दरी कहने लगी पहले मैं भैसों को छुड़ाती हूं फिर आपसे बात होगी. राजा ऐसी व्यंगात्मक बातों को सुनकर सन्न रह गए. भैंसों के सम्मुख वह सुंदरी उत्तेजित हो जा पहुंची. राजा के सिपाही आश्चर्य पूर्वक फटी आंखों से देखने लगे.

उस सुंदरी ने मैदान में जाते ही क्रोध स्वरूप दोनों भैसो के कान पकड़ लिए और दोनों दिशाओं की तरफ जोर जोर से धक्का मारते हुए बकरी के बच्चों की तरह उन भयंकर भैंसों को झटका दिया. फिर दोनों भैंसे ऐसे भागे कि उन्होंने पीछे की तरफ भी नहीं देखा राजा के सामने यह एक आश्चर्यचकित करने वाला दृश्य था. जबकि राजा के बड़े बड़े योद्धा भी उनकी लड़ाई छुड़ाने में असमर्थ हो गए थे.

राजा ने फिर उस सुंदरी का परिचय जानना चाहा राजा पूछते हैं, सुंदरी तुम किसकी बहू बेटी हो. यह सुनते ही सुंदरी कहने लगती है. यह सब हाल समाचार जानकर हे राजा! तुम क्या करोगे थोड़ी देर बाद ही अपने घर को वापस लौट जाओगे फिर सुंदरी अपना परिचय देते हुए कहती है.

मैं पंच नाम देवताओं की सबसे छोटी बहन हूं हे राजा! मेरा नाम कलिंका  है ऐसा सुनते ही राजा उसे भली प्रकार देखने लगे वो सुंदरी की मनमोहक छवि देख कर मन ही मन विचार करते हैं कि यह सुंदरी उस घर की शोभा बढ़ाएगी.

राजा को देखकर कलिंका कहने लगी राजा आप तो विचारों में डूबे जा रहे हो क्यों चुप हो आप भी अपने दिल की बात कहो, मैं किसी से नहीं कहूंगी. तब राजा अपने मन की बात कह देते हैं. वह बोलते हैं कि आप हमारी आठवीं रानी यदि हो जाए तो बड़ा ही अच्छा होगा, यही विचार मेरे मन में आ रहा है.

यह सुनकर कलिंका अपना परिचय देने लगी. एक मेरे चाचा यहां पर रहते हैं. मैं उनकी इकलौती संतान हूं. वह बहुत बड़े देव भक्त हैं. उनके हाथ पांव में कुष्ठ रोग हैं. उन्हें यहां बड़ा ही कष्ट है. उन्होंने ही मेरा लालन-पालन किया है. मैं उनकी भतीजी हूं जो भी वह करेंगे वह उनकी इच्छा पर निर्भर करता है.

अब कलिंका राजा को बुलाकर अपने चाचा के पास ले गई. राजा चाचा की पीड़ा को समझ कर उनकी सेवा करने लगे और राजा ने चाचा की बहुत खूब खिदमत की तब राजा और कलिंका चाचा को एक दूसरे को अपनी-अपनी विपत्ति बताते हैं. चाचा कलिंका से कहते हैं बेटी तू ऐसा सेवक कहां से लाई है. हमसे तो अधिक दुखी इसकी घर गृहस्ती है, सात रानियां होते हुए भी संतान उत्पन्न ना होने से दुखी है.

इसकी भाग भोग में एक भी संतान नहीं है हे पुत्री तेरे हाथों ही इस राजा का उद्धार हो सकता है. ऐसा कहते ही उनका गला भर आया आंखों से आंसुओं की धारा निकल पड़ी और राजा मन ही मन बहुत प्रसन्न हुए वह सोचते हैं, क्या पता मेरा सूखा हुआ वंश वृक्ष फिर से अंकुरित हो जाए. तब राजा हाथ जोड़कर कुष्ठ रोग से ग्रसित ऋषि के चरणों में नतमस्तक हो गए और कहते हैं हे मुनि मुझे पुत्र का वरदान दीजिए नहीं तो धुमाकोट में राजा का घर बंजर हो जाएगा. तब मैं अपनी पित्र ऋण से उऋण कैसे हो सकूंगा मुझे इसी कर्ज का डर सता रहा है.

राजा बड़ी मुसीबत में पड़े हैं इसलिए कलिंका का हाथ थाम लेते हैं हाथ पकड़ते ही कलिंका छोटे पिता ने उन्हें आशीर्वाद दिया तुम्हारे कुल में उजाला हो जाए इस दुख के दौर में एक पुत्र उत्पन्न हो जाए ऐसा कहते ही उस संत ने लड़की और दामाद के पांव धो डालें और कुछ समय बाद चाचा ने अपने प्राण निकाल दिए और स्वर्ग को चले गए.

कलिंका को धूमागढ़ लाने का वृतान्त

राजा ने चाचा का दाह संस्कार एवं क्रिया कर्म किया. इसके बाद संतान की ममता के कारण राजा झलराई आठवीं रानी को विवाह कर घर ले आए. रानी कलिंका को लेकर राजा चंपावत आ गए. यह देखकर साथ अन्य रानियां अत्यधिक चिढ़ गई और राजा को व्यंग करने लगी. हे राजा वृद्धा अवस्था में आपकी बुद्धि कहां खो गई है. सातों रानियों से तो संतान पैदा नहीं हुई. अब आप आठवीं रानी भी ले आए.

यदि संतान होने वाली होती तो सात रानियों से ही अनेक बच्चे हो जाते हैं और रानियां कहती है आप इस उम्र में सठिया गए हैं. कलिंका राजा की आठवीं रानी है जो सबसे छोटी है सात सौतने बढ़ा चढ़ाकर उसकी खिल्ली उड़ाते हैं.

विवाह के बाद राजा को ज्योतिष द्वारा बताया हुआ रास्ता याद था राजा ने अपने कुलंकारी देव ईस्ट भैरव देवता का पूजन करने के लिए ज्योतिषियों को बुलाया भैरव देवता को राजा ने देवता को दूध से नहलाया कन्या कुँवारियो के पॉव धोये उन्हें भोजन कराया और हाथ जोड़कर पुत्ररत्न का सफल मनोकामना भैरव देवता से की.

रानी कलिंका को सातों सौतन बहुत परेशान किया करते थे और हृदय घाटी व्यंग सुनाया करते थे. तब प्रभु ने एक ऐसा चमत्कार कर दिखाया कलिंका के गर्भ को रुके 1 माह का समय व्यतीत हो गया जब राजा ने और सुना तो उन्हें आशा की किरण दिखाई दी. तब राजा ने सातों रानियों को अपना हुक्म सुनाया कि मेरी कही बातों का पालन करते हुए कलिंका की सेवा करो और कलिंगा का ध्यान भली-भांति रखो.

अब वह समय आ गया था. जब तीनों लोको के नारायण गर्भ द्वार के समीप पहुंच गए थे. लेकिन सौतनों ने दिन रात कलिंका के लिए षड्यंत्र करते रहती थी वह कलिंका के गर्भ को बुरी दशा से ग्रसित बताते थे और कलिंका को बोलते है यदि मां अपने बच्चे का मुंह होते देख लेगी तो दोनों मर जाएंगे ऐसा हमारे ब्राह्मण कह गए हैं. यदि 7 दिन तक मां बच्चे को और बच्चा मां को नहीं देखेगा तो दोनों के कष्ट 7 दिन के भीतर ठीक हो जाएंगे.

ऐसा बोलते ही कलिंका के आंख कान में काले कपड़े की पट्टी बांध देते हैं और रसोई से सिलबट्टे को मंगा लेते हैं. अब गर्व से शिशु पैदा होने का समय आ गया प्रभु तब पैदा होने लगे पीपल की सूखी डालिया पुनः हरि होने लगी.

श्री गोलू देव(golu devta) गृह कष्टों का वृतान्त

तब सातों सौतने षड्यंत्र रचती हैं और मिट्टी का फर्श काट देती है .ताकि वहां से बच्चा निचली मंजिल गिर जाता है. जहां गाया बधी थी तब सौतने सोचती हैं कि गिरने से चोटिल होकर वह मर जाएगा लेकिन वह तो अवतारी बच्चा था. वह नीचे गिरते ही गौ माता के घास रूपी बिछावन में सो जाता है.

ऐसा होने के बाद सातों रानियां कलिंका से कहती है कि तेरे से सिलबट्टा पैदा हो गया है. अब तू तो सातवें दिन के बाद इनका मुंह देख सकेगी. जब रानी सिलबट्टा पैदा होने की बात सुनती है. तो उसके दोनों जगहों के दांत आपस में सट जाते हैं. वह अपना होश खो बैठती है. तभी सातों सौतने मन में काफी प्रसन्न होकर राजा के पास जाती हैं और राजा को बोलते हैं. कि रानी कलिंका से पत्थरों के टुकड़े पैदा हो गए हैं यह सुनते ही राजा दोगुनी दुखी हो जाते हैं और बड़ी शर्मिंदगी महसूस करते हैं.

तब राजा अपनी किस्मत को कोसने लगते हैं. बोलते हैं भिखारियों के घरों में तो बिना ईश्वर से मांगे ही पुत्र पैदा हो जाते हैं, हमारी तो किस्मत ही खराब है. वहीं दूसरी तरफ गौशाला में एक बहुत बड़ी गाय है जो आदमियों को मारने को दौड़ती है और आदमियों को अपना दुश्मन समझती है जिससे बचना बड़ा कठिन काम है.

उस बाँझ गाय को इस वक्त नींद आई है. वह सपने में अपना बच्चा उत्पन्न हुआ देख रही है. अब गाय की नींद टूट जाती है. वह अपने बंधने के स्थान पर खड़ी हो जाती है और बच्चे को वहां पड़ा देख उसके चारों थन दूध से भर आते हैं. आजन्म बाँझ गाय के हृदय में ममता जाग उठी वह बच्चे को चाटने लगी क्योंकि उसे भी बछड़ा न उत्पन्न होने का दुख सता रहा था. तब वह गाय जिसके थन अब दूध से भरे हुए हैं. बैठकर बच्चे को दूध पिला रही है यह बड़ी कठिनाइयों में पैदा हुआ बालक है जो गाय के थन चूसते हुए गटागट दूध पी रहा है

बहुत समय व्यतीत हो गया है अब सातो सौतने सोचने लगी हैं कि शिशु गौशाला में मर गया होगा. वह मन ही मन अति प्रसन्न होती हैं. तब आधी रात को सभी गौशाला में पहुंच गए. जब उन्होंने गौशाला में जाकर देखा तो आश्चर्य में पड़ गए. वह बोलती है, हम तो मरेगा मरेगा कहते थे यह सोतेला तो खूब तेज तर्रार हो रखा है. तो सातों रानियां कहती हैं.

अब इसे यहां से उठाओ और दूसरा उपाय सोचो कहीं गहरे तालाब – श्मशान घाट में से फेंक दो. जब बच्चे को उठाने लगे तो गाय मारने को जाने लगी उन्होंने जैसे-तैसे बच्चे को वहां से उठा लिया और घने जंगल की तरफ निर्दयता पूर्वक ले जाने लगे उधर गाय बालक को अपना बछड़ा समझ जोर-जोर से रंभा रही थी.

फिर सात सौतने घास की घनी झाड़ियों (बिच्छू घास जिसे सिसोड भी बोलते कुमाऊँ में ) में जहां एक खूंखार सांप भी रहता है. रात्रि के मध्य में नन्हे बालक को वहां फेंक देते हैं और उधर रानी कलिंका को पट्टी बांधे सात दिन पूरे हो जाते हैं. उसके मन में सिलबट्टे को देखने की बहुत इच्छा होती है. सोचती आखिर कैसा सिलबट्टा होगा मां के हृदय की पीड़ा को कोई भी नहीं रोक सकता.

जैसे ही रानी कलिंका के आंखों की पट्टी खोली तो उसने अपने दोनों लालो को सिलबट्टे के रूप में देखा तो उसकी आंखें से अविरल अश्रु धरा फूट पड़ी सोचती है, की आदमी से तो आदमी पैदा होते हैं. मुझसे पत्थर कैसे पैदा हो गए. इस प्रकार रानी कलिंका बहुत दुखी हो जाती है और बार-बार सोचती है कि इस सिलबट्टे को कैसे कपड़े पहनाऊंगी? कैसे नहालाऊंगी? फिर वह सिलबट्टे का मुंह देख देख कर दुखों को भूला लेती है. उसके तो सिलबट्टा ही पुत्र पुत्री है. वह उन्हें थपथपा कर लोरी सुनाती है.

और दूसरी तरफ बच्चे ने रात दिन एक कर सात रातें झाड़ियों में नंगे भूखे प्यासे बिता डाली. उन झाड़ियों में रहने वाले सर्प के सात टुकड़े कर डाले .यह तो एक अवतारी बालक था. इसका भला मौत क्या बिगाड़ सकती थी. तब सात दिनों बाद सौतने वहां बच्चे को देखने आती है. वह देखती है कि बच्चे ने जंगली सर्फ के टुकड़े टुकड़े कर दिए हैं और बहुत छोटा नवजात शिशु वस्त्र विहीन नग्न शरीर वहां पड़ा हुआ है और खेल रहा है. उनकी मारने की दोनों योजनाएं असफल हो जाती है.

उसके बाद फिर से सौतने बच्चे को मारने का नया जाल बुनती हैं और एक सौतन कईया लोहार के वहां से एक बहुत बड़ा बक्सा बनवा कर ले आती है. तब तक सभी सौतने बच्चे को लोहे के संदूक में डाल देते हैं और उसमें सात ताले लगा देते हैं फिर भारी बक्से को उठाकर काली गंगा में बहा के आ जाते हैं.

वह सोचते हैं कि बालक नदी में डूब कर मर जाएगा फिर गंगा की तीव्र धारा में लोहे का बक्सा बहने लगता है उस पर लगे ताले आवाज कर रहे हैं. और नदी के मध्य विशाल पत्थरों से टकराता हुआ बहता जा रहा है और इधर सौतनों के हृदय में शांति पड़ गई आज सब ने अपना अंतिम क्रोध निकाल दिया.

उधर राजा शर्म के मारे सिर नहीं उठा पा रहे हैं तब अत्यंत शर्मिंदगी के साथ सिलबट्टे का नामकरण संस्कार किया जाता है. सिल रुपी पुत्र का नाम हरवा और बट्टा रूपी पुत्र का नाम कलुआ रखा गया. रानी कलिंका सिलबट्टा को पुत्रों की भांति पालती है.

उधर काली गंगा में बहाया हुआ बक्सा गोरी गंगा के घाट में जा पहुंचा. वहां गंगा में मछुआरे मछली के शिकार करने को आए हुए हैं. जो मछली को मार कर बेचते और अपने परिवार का भरण पोषण करते हैं. इन्हीं मछुआरों के साथ एक भाना नाम का मछुवारा (धेवर) है. जो मछली मार कर अपने परिवार का पालन पोषण करता है और उसकी कोई संतान भी नहीं है.

भाना घेवर को गंगा में शिशु की प्राप्ति

वह हर रोज की भांति जाल को पानी के तीव्र भाव में डालता है. मन ही मन कह रहा है ना जाने आज क्यों गंगा लोटपोट ले रही है. उस भाना देवर को कुछ समझ नहीं आ रहा है कि मछली पकड़ने के लिए जाल कहां डालें तब वह अपने देवताओं का नाम हृदय से याद करते हुए पानी में जाल डाल देता है. जाल डालते ही वह अत्यंत भारी हो गया. तब वह धेवर जाल को नहीं खीच पाता है खींचते खींचते उसके हाथ में छाले पड़ जाते है.

अन्य मछुआरों की सहायता से उसके जाल को खींचा जाता है तब वह देखता है कि जाल में तो एक बक्सा फसा है. जिसमें 7 ताले लगे हुए हैं फिर वह तालो को तोड़ कर उसको खोलता है. तो उसमें बालक को देखता है. जिसके आंख, मुंह और कान बालू (रेत) से बंद हुए हैं. तब वह बच्चे के मुंह में घुसा बालू निकाल देता है और नन्ही आंखों से पानी से पढ़ी जालो को पोछ देता है.

तब सभी मछुआरे बोलते हैं की भाना धेवर तेरी कोई संतान नहीं है मां गंगा ने तेरी मनोकामना पूरी कर दी है. जब तेरी पत्नी बच्चे का मुंह देख लेगी तो मन ही मन अत्यंत प्रसन्न होगी और इस बालक के साथ मग्न होकर वो अपनी संतान पीड़ा को भूल जाएगी तब भाना धेवर बच्चे को घर ले जाता है. जैसे ही उसकी पत्नी बालक को देखती है तो बोलती है कि आज सुबह-सुबह किस के बच्चे को उठा लाए.

ऐसा कहते ही उसकी छाती दूध से भर आई तब उसने बच्चे को पकड़कर अपनी गोद में ढक लिया. दूध से उसकी छाती एवं दया से उसकी आंखों में आंसू भर आए तब वह नवजात शिशु उसके मुंह को पलकें झपकाए हुए देखता रहता है.

धेवर जो कि काफी गरीब है. जिसके घर में दूध दही का अभाव है. घर में भैंस गाय कुछ नहीं है. यह स्थिति भाना देवर की है. फिर मां एक ब्यायी हुई गाय गले के चांदी के हार बेचकर मगाती है. बोलती है इस तरह से तुझे किसने बहाया होगा. वह निर्दयी कौन थे ? ऐसा बोल बार-बार गले से लगाती है. वह बच्चे को हिला हिला कर लोरी सुनाती है.

अब नामकरण का दिन निकट आ जाता है. अपने मित्र एवं रिश्तेदारों को धेवर ने बुलावा भेजा अंततः बच्चे का नाम ब्राह्मणों ने बाला गोरिया (golu devta) रखा. क्योंकि गोरी गंगा घाट मैं बच्चा मिला इसलिए गोरिया ही होना चाहिए नामकरण की दाल एवं चावल सबने भरपेट खाया फिर सब मित्रों का टीका एवं सत्कार कर विदा करा. तब सब मित्रों ने आशीर्वाद दिया कि बाला गोरिया और भाना देवर का नाम सदा ही अमर हो जाए.

धेवरानी बालक को गोलू गोलू कहकर पुकारती है. धीरे-धीरे बालक पेट के बल घसीटते हुए हाथ पांव टेक कर चलता है. धीरे-धीरे बालक बड़ा होता है रुक रुक कर खड़े होकर गोलू देव (golu devta) अलमारी को खोल देते हैं. दूध दही को गिरा देते हैं और बंदर के बच्चे की तरह हरकतें करते हैं. बाला गोरिया (golu devta) बड़े उतावले शिशु है. इन्हें पकड़ते पकड़ते मां की हालत खराब हो जाती है. वह काफी तेज तर्रार हैं.

बच्चे को किसी की बुरी नजर ना लगे इसलिए मां सुबह शाम प्रत्येक दिन राई चढ़ाते हैं. अब शिशु दीवार पकड़ कर खड़ा होने लगा है. हाथ पांव के बल आंगन में दौड़ने लगा है और बाला गोरिया बड़ा ही फुर्तीला बालक है कभी-कभी माता-पिता को बाल हट भी दिखा देता है.धेवर की पत्नी कहती है हम तो अब संतान दुख भूल गए हैं. इन मछुआरों के बच्चों में गोलू बड़ा ही तीव्र बुद्धि का बालक है. दिखने में अति सुंदर ऐसा लगता है कि यह कोई महान विलक्षण वाला हो.

वहीं दूसरी तरफ राजा के घर प्रत्येक दिन सुबह से भीड़ लगी रहती है. दूर-दूर से लोग अपना काम धंधा छोड़ कर यहां देखने आते हैं कि मनुष्य से कैसे सिलबट्टे पैदा हुए सातों सौतने कलिंका का तिरस्कार करती है सिलबट्टे की हंसी उड़ आती है और सभी को दिखाती हैं.

अब बाला गोरिया (golu devta) 7 वर्ष के हो गए हैं. एक रात नींद में गोलू (golu devta) ने सपने में देखा कि उसकी मां कलिका कितनी बेचैन है. मेरे पिता चंपावत के राजा हैं सातो सौतनों के कारण उनकी ऐसी बुरी हालत हुई है. सपने में गोरिया ने सब कुछ जान लिया सपने में उसकी वास्तविक मां कहती है कि हम भाग्यहीन हैं.

तब गोरिया (golu devta) वहां जाने की सोचते हैं और इसी सोच विचार में गोलू डूबा रहता है मां-बाप सोचते लगे ना जाने कौन से विचारों में बच्चा डूबा है तब उसकी धर्म माता भाना पूछती है बेटा तुझे कौन सा दुख है किसी ने तुझसे ना कहने वाली बात तो नहीं कह दी तेरे मन में क्या किसी ने कोई भ्रम तो नहीं डाल दिया गोलू तू तो हम जैसे गरीब लोगों की आशा की किरण है. यह वक्त तो अत्यंत निर्दयी है. तब गोलू (golu devta) अपने पिता को अपनी बात सुनने को कहता है और कहता है कि मेरे खेलने के लिए एक घोड़ा घर में ला दीजिए.

गोरिया (golu devta) घोड़े की रट लगाए रखता है मछुआरे का पालन पोषण करना ही कठिन हुआ है वह घोड़ा कहां से लाए? लेकिन गोरिया अपनी बाल हट में अड़े रहते हैं. तब एक दिन वह पिताजी से कहते हैं, पिताजी आप घोड़ा क्यों नहीं लाए ? हर रोज कहते हैं लाऊंगा लाऊगा यदि आप घोड़ा नहीं लाओगे तो मैं गंगा में डूब कर मर जाऊंगा यह सुनते ही मछुआरे की पत्नी डर जाती है और कहती है जैसा गोलू (golu devta) कह रहा है वैसा आप कर दीजिए.

अगर इसे कुछ हो गया तो हम कल को कहां जाएंगे यदि यह मर गया तो मैं भी मर जाऊंगी ऐसा कहते ही उसने अपने कान के सोने के झुमके उतार दिए कहने लगी इन्हें बेच कर घोड़ा ले आइए. सब बच्चे और मां की जिद्द को देखकर गोलू (golu devta) के पिता कहने लगे मैं लकड़ी का घोड़ा बनवाने के लिए कह आया हूं. कल उठा लाऊंगा लकड़ी के कारीगर ने लकड़ियों को जोड़कर एक सुंदर घोड़ा निर्मित कर डाला.

तब बच्चा (golu devta) पिता से कहने लगा पिताजी आप तो काठ का सुंदर घोड़ा ले आए और फिर छोटा सा गोलू (golu devta) नामक बालक हर्ष से इसमें चल जाता है. हट हट की आवाज देते हुए घोड़ा चलने लगता है. जिस समय जोर से हाथ मारता है तो घोड़ा तेज दौड़ता है मानो उड़ रहा हो. अब तो दूर-दूर तक गोरिया (golu devta) घूमने चले जाते हैं. और सोचता है कब अपने माता पिता से मुलाकात होगी.

गांव-गांव घर-घर में अब ऐसी अफवाह चली है की लकड़ी के बने घोड़े में गोलू (golu devta) घूमने जाता है. यह एक अनोखी बात है. जहां कहीं भी उसकी काठ की घोड़ी जाती है वहां देखने वालों का मेला लग जाता है. एक दिन जाते जाते बाला गोरिया (golu devta) धूमागढ़ पहुंच जाता है, यहां राजा का बहुत बड़ा शहर एवं राजधानी भी बहुत बड़ी है. यहां चलते चलते दोनों थक चुके होते हैं घोड़े को प्यास लग गई थी.

सात सौतनों से गोल ज्यू (Golu Devta) का विवाद

तब वह देखता है सातो रानियां बैठी हुई है जो पानी भरने के लिए छोटे कुएं(नौले) में आई है. गुजरे दिनों की चुगल बंदी हो रही है और जोर शोर से गपशप चल रही है और सभी राजा और कलिंका की खिल्ली उड़ा रहे होते हैं. नींद में गोलू (golu devta) द्वारा देखे गए सपने सच हो गए ईश्वर के अवतार गोलू देवता (golu devta) अपने मन में सोच विचार करने लगे कि जब मैं इनको परेशान करूंगा तो राजा तक अवश्य शिकायत पहुंची पहुंच जाएगी तब यह बात सुनकर राजा न्याय भी कर देंगे.

तदोपरांत काठ के घोड़े में बैठकर वह बालक (golu devta) पानी के समीप पहुंच गया और रानियां बीच रास्ते में बैठी थी. किसी ने रास्ता नहीं छोड़ा तब सभी रानियां कहने लगी राजा के इस नाले में आने का आदेश किसी को नहीं है. इस नाले केवल एक राजा के वंशज पी सकते हैं, ऐसा इस नौले का धर्म है तब सभी रानियां हंसी और मजाक में बालक को बोलती है अरे काठ की घोड़ी भी कहीं पानी पीती है. इसके आंख मुंह सब लकड़ियों को जोड़कर बने है तू सबसे पहले यह बता कि ये घोड़ा है या घोड़ी है नहीं तो हम इसे तोड़ देंगे.

तब गोलू (golu devta) बोलते है  जैसे तुम सातों ना नारी हो ना पुरुष ही हो क्योंकि तुम गर्व की पीड़ा का अनुभव हृदय से कैसे कर सकोगी. तुम कैसे कह सकते हो कि यह लकड़ी का घोड़ा पानी नहीं पी सकता? जब गर्भवती से सिलबट्टा पैदा हो सकता है तो क्या यह काठ का घोड़ा पानी नहीं पी सकता ऐसा सुनते ही सब खिसिया कर जीभ दबाने लगी.

तब उस बालक (golu devta) को सातों सौतने अपना क्रोध दिखाते हुए गालियां बकने लगी. तब सौतने कहती हैं हम तेरी शिकायत राजा से करेंगे और राजा तुझे फांसी में लटका देंगे या फिर तू इस नौले से चले जा तेरी बुद्धि ना जाने क्यों नष्ट हो गई है. तब गोलू (golu devta) कहते हैं इस नौले से क्यों जाऊं यही पर न्याय होगा पाप से भरे घड़े फूट जाएंगे क्योंकि अपराध बहुत हो गए हैं.

तब रास्ते को छोड़कर हवा में घोड़ी उड़ गई और सातों सौतन को लाघ कर नौले के पास खड़ी हो गई. गोरिया (golu devta) ने तो सच्ची बात कही परंतु सबको मिर्च की तरह कड़वी लग गई. तदोपरांत लकड़ी की प्यासी घोड़ी पानी पीने लगी तब गोलू देवता (golu devta) को सातो रानीया ना कहने लायक गालियां बकने लगी.

इन सातों रानियों की गालियों को सुन सुनकर बालक गोलू (golu devta) के कान भर गए तब गोलू मन ही मन सोचने लगे. अब बदला लेने का ठीक समय जानकर अवतारी गोलू देवता (golu devta) ने अपने कमर में रखी गुलेल निकाल दी और सातों रानियों के सर पर रखें पानी के घडो पर गुलेल से निशाना चला दिया और घड़े सर पर ही फूट गए तो पानी के घड़े सिर पर फटने से रानियां बुरी तरह भीग गई मानो कोई नदी में डूबते हुए पार कर आई हो.फिर सातो रोती बिलखती हुई राजा के सम्मुख जा पहुंची तब राजा से बालक गोरिया (golu devta) की शिकायत करती हैं

राजा बालक गोरिया (golu devta) को दरबार में पेश होने को कहते हैं. तब राजा के हुकुम से सिपाही बालक (golu devta) को पकड़ने के लिए चल देते हैं. थोड़ी देर में लकड़ी के घोड़े सहित बालक को पकड़ लाए तब राजा को उसे देखकर बड़ा आश्चर्य हुआ लकड़ी के घोड़े में बैठकर यह बालक कैसे भ्रमण करता है. यह देखने में राजकुमार जैसा लगता है मगर कपड़ों में टालिया पड़ी है. बूढ़े राजा इन्हीं विचारों में डूब गए तद्यपि राजा ने पूछा तूने इनके पानी के घड़े क्यों थोड़े फिर यह बता कहीं यह लकड़ी की का घोड़ा भी पानी पी सकता है.

तब गोलू (golu devta) ने राजा को फौरन उत्तर देते हुए कहा जैसे स्त्री से सील और बट्टा उत्पन्न हो सकता है वैसे ही मेरे काठ का घोड़ा भी पानी पी सकता है. तब राजा से बच्चे का प्रश्न का उत्तर देते नहीं बना. तब राजा ने अपने आप बच्चे का नाम पूछा उन्होंने पुनः राजा आग्रह करने लगे अपना नाम बताओ तुम्हारा ठोर ठिकाना कहां है? यहां किस काम से आए हो तब बालक कहने लगते हैं हे राजन जो मैं आपसे कहूंगा उस बात पर तुम्हें यकीन कैसे आएगा?

तब तब बालक कहते हैं कि मेरा नाम गोरिया है मेरा लालन-पालन धेवर ने किया है. हे राजा झलराई मैं तुम्हारी रानी कलिंका का पुत्र हूं. तब राजा कहने लगे सच सच बता किसने तुझे ऐसा कहने को कहा कि तू मेरा राजकुमार है मेरी राजगद्दी पर किसने अपनी कुदृष्टि लगा रखी है. तब बच्चा कहता है मुझे पैदा होते ही फर्श काट कर नीचे फेंक दिया गया. बहुत कठिनाइयों के साथ मैंने समय व्यतीत किया एक वर्ष पूर्व से मैं इस सपने देख रहा हूं. मेरे सपने आज सच हो गए हैं.

माता कलिंका का अपने पुत्र गोलू से मिलन एवं सौतनों को दण्डित करने का वृतान्त

तब राजा कहने लगे जब तू मेरा राजकुमार है तू तेरा परिचय क्या है कि तू मेरा पुत्र है.क्या सभा के मध्य कोई एक प्रमाण प्रस्तुत कर सकता है तब बच्चा अपनी मां कलिंका को बुलाने को आग्रह करता है तब दयावंती माता कलिंका को वहां बुलाया जाता है. गोलू (golu devta) को देखते ही उसकी सूखी छाती दूध से भर आई. गोलू (golu devta) का चेहरा देखते ही कलिंका के स्तनों से दूध की धाराएं गोलू के मुंह तक बहने लगी. बालक दूर से ही दूध पीने लगा वह चमत्कारी था. गोलू कहता है माता आज मैं जी भर कर दूध पी लेता हूं.

ऐसा दृश्य देखकर राजा संपूर्ण सभा का हृदय गदगद हो गया आंखों में आंसुओं की धाराएं फूट पड़ी तब बारी-बारी से राजा ने सौतनों को बुलाकर पूछा और उन सातों सौतनों ने अपनी गलती कबूल कर ली.

राजा ने आदेश दिया कि सातों रानियों को पहले टांग दो फिर काट दो काटने के बाद टुकड़े-टुकड़े कर उबलते तेल में तल दो. सुनसुनिया घास को पानी में डुबोकर झपा झप लगाओ तब सातो हाथ जोड़कर पांव पकड़ती है यह तो ऐसी सजा के लायक ही है. मारते मारते राजा के जल्लादों ने सौतनओ की खाल खींच ली. शरीर के कटे स्थानों पर पीसी मिर्च छिड़ककर बुरे हाल कर दिए.

इनकी बुरी दशा देखकर नारायण स्वरूप गोलू देव (golu devta) को दया आ गई क्योंकि यह दया के रूप में पूजे जाने वाले ह्रदय से दयालु थे. तब इन सातो सौतनों को देश से निकाल दिया गया. सब दर्शक और श्रोता कहने लगे जिसने बच्चे का लालन-पालन किया उसका भला हो जाए सच्चा पुत्र तो बाढ़ में बहने के बाद भी जीवित उतर आता है.

तब राजा रानी एवं रानी को ढेर सारी बधाइयां देने लगे रानी कलिंका चुंबन देते हुए कह रही है आज तक मेरी ममता से परे कहां रहा? राजा झलराई अपनी गोद में गोलू (golu devta) को उठा लेते हैं तब गोलू (golu devta) राजा रानी को धेवर के वहां मुलाकात कराने को ले जाता है कहने लगा यह तो मेरे धर्म के माता-पिता हैं मैं इनके प्राणों के समान हु. धेवर के घर पहुंचकर सब की मुलाकात हो गई दोनों घरों का एक घर और एक आत्मा हो गई सभी मिलजुल कर चंपावत में निवास करने लगे.

फिर सभी रानी कलिंका को कहने लगे हे रानी यह सिलबट्टा तो बोलने वाले नहीं है. भले ही इन्होंने तेरा सुख के समय अमूल्य साथ दिया हो तो भी यह किसी काम के नहीं है इसलिए सब कहने लगे इन्हें कहीं नदी में फेंक देना चाहिए ऐसा सुनकर मां कलिंका विलाप करने लगी. बोलती है हरवा एवं कलुआ इनका नाम रखा गया नामकरण भी किया गया.

इन्हीं के सहारे मेरा असली कठिन वक्त में बच्चे के स्थान पर सिलबट्टे को गोद में लिया 7 वर्ष तक इनकी बहुत सेवा की यदि नदी में इन्हें फेंक दिया जाएगा तो वह कैसे वहां रहेंगे? इनकी दशा कैसी हो जाएगी? पंच नाम देवताओं की बहन रानी कलिंग का रोने लगी सिलबट्टे का पालन पोषण करने के बाद अब इन्हें नदी में कैसे फेंका जाएगा यह सिलबट्टे तो मनुष्य के लिए है. माँ ने तो इनके साथ अपनी संतान की तरह व्यवहार किया है.

तब राजा रानी को समझाते हैं कि तू पागलपन मत दिखा अब हमारा बच्चा हमें मिल गया है. निर्जीव पत्थरों पर क्यों भरोसा करती है. मां कालिका कैसी दुविधा में पड़ गई है. तब उसने देवताओं को आवाज दी और समाधान निकल पड़ा पंचनामा देवता कलिंका के सम्मुख प्रकट हुए और कहने लगे बहन कलिंका हम तेरे सम्मान की रक्षा करेंगे सिलवटें में देवताओं ने तत्काल प्राण सींच दिए. प्राण सींचते ही रानी के 2 पुत्र तत्काल खड़े हो गए. रानी के मन इच्छा के अनुरूप 3 पुत्र हो गए जो अपने बड़े भाई गोलू की मदद करेंगे अब राजा काफी बूढ़े हो चुके हैं.

श्री गोलू देव का राज वृतान्त

राजा ने गोरिया के हाथ में राजगद्दी सौंप दी.हरुवा एवं कलुआ उनके मंत्री थे. गोल्ज्यू इंसाफी अर्थात बड़े न्याय प्रिय थे वैसे भी यह अवतारी रत्न थे. जिस समय गोल्ज्यू ने राजगद्दी संभाली यहां का नाम काली कुमाऊं रखा बाद में इसका नाम कुमाऊं हो गया. गोल्ज्यू के राज में चोरी दुश्मनी एवं धन की कोई चिंता किसी को नहीं थी. गोलजू का न्याय घर-घर तक प्रचलित था. हरुवा एवं कलुआ पाषाण पुरुष उनके मंत्री थे.

golu devta
गोलू देवता की प्रतिमा

गोलू देवता (golu devta) का न्याय सबके घर घर का इंसाफ करता था और गोलू देवता (golu devta) मुसीबत में पड़े दुखियों की आवाज को सुनते थे इसलिए गांव गांव में श्री गोलू देवता (golu devta) के मंदिरों की स्थापना हुई त्यौहार एवं शुभ अवसरों पर पूजा की पद्धति चली. अल्मोड़ा के चितई में गोलू देवता का मंदिर पड़ता है जहां सभी लोगो की मनोकामनाएं पूरी होती है और कल्याण होता है जहां पूजा में जुड़वा बकरी हरवा और कलुआ नाम के रक्षकों को चढ़ाया जाता है. फूल बत्ती एवं जुड़वा निशान गोल्ज्यू को चढ़ाते हैं.

golu devta temple
अल्मोड़ा चितई में गोलू देवता का मंदिर

श्री भगवान गोरिया अवतारी हैं. उन्हें दूध का भोग लगता है. जो अपने सेवकों के कठिन दुखों का निवारण करते हैं. गोलू देवता (golu devta)को हर जगह अलग अलग नामो से भी जाना जाता है जैसे चिड़ियों का दुख दूर करने के कारण गोल्ज्यू का एक नाम चौड़ गोलू पड़ गया. जमीन का विवाद निपटाने के लिए स्यर गोलू नाम पड़ा वन में इंसाफ करने के कारण बणी गोलू पड़ा और भीतर का इंसाफ करने की वजह से देव गोलू  (golu devta) की स्थापना एवं पूजा की जाती है. जहां तहां के नाम से गोलू देवता (golu devta) पूजे जाते हैं.

golu devta
गोलू देवता (Golu Devta)

गोलू देवता के मंदिर Golu Devta Temple, Golu Devta Mandir

गोलू देवता (golu devta) कुमाऊ के इष्ट देवता भी है इसलिए कुमाऊं में प्रत्येक गांव में गोलू देवता का मंदिर होता है. गोलू देवता (golu devta) का सबसे प्रसिद्ध मंदिर अल्मोड़ा जिले में है जिसे चितई ग्वेल (Chitai Golu) नाम से जाना जाता है. अल्मोड़ा से 8 किलोमीटर दूर पिथौरागढ़ हाईवे पर गोलू देवता का मंदिर स्थित है यह भव्य मंदिर सड़क से कुछ कदम की ही दूरी पर है. जहां चारों तरफ घंटिया ही घंटियां है इस मंदिर में गोलू देवता की मूर्ति है जिसमें गोलू देवता (golu devta) सफेद घोड़े में सवार और धनुष बाण लिए है. ऐसी मान्यता है कि इस मंदिर की स्थापना चंद वंश के एक सेनापति ने 12वीं शताब्दी में कराई थी.

 

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गोलू देवता (golu devta) मंदिर

गोलू देवता के मंदिर के दर्शन

यह मंदिर की चीड़ के घने जंगलों से घिरा हुआ है हर साल भारी संख्या में देश विदेश से यहां श्रद्धालु पूजा-अर्चना करने आते हैं क्योंकि गोलू देवता न्याय के देवता है इसलिए लोग यहां स्टांप पेपर पर लिख कर मन्नतें मांगते हैं और मन्नतें पूर्ण होने पर यहां घंटियां चढ़ाते हैं.

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गोलू देवता (golu devta) मंदिर में घंटिया

इस मंदिर के बारे में एक मान्यता यह भी है कि यदि कोई नवविवाहित जोड़ा इस मंदिर में दर्शन के लिए आता है तो उसका रिश्ता सात जन्मो तक बना रहता है इसलिए कुमाऊं में शादी के बाद नवविवाहित जोड़ा गोलू देवता (golu devta) के दर्शन को जरूर जाता है.

गोलू देवता के अन्य मंदिर golu devta temple

  • गोलू देव मंदिर , चितई , अल्मोड़ा
  • चम्पावत गोलू मंदिर , चम्पावत
  • घोडाखाल गोलू मंदिर , घोडाखाल
  • ताड़ीखेत गोलू मंदिर , ताडीखेत
golu devta
गोलू देवता (golu devta) मंदिर में लाइन में खड़े भक्त

तो दोस्तों यह गोलू देवता (golu devta) की कहानी आपको कैसी लगी कमेंट में अवश्य बताएं यह कहानी हमने कवि कृष्ण सिंह भाकुनी जी की किताब श्री गोलू देवता की पौराणिक लोक कथा से ली है यह किताब आपको अल्मोड़ा में चितई गोलू मंदिर या फिर कुमाऊं के कई किताबों की दुकानों में आपको मिल जाएगी.

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Thank you धन्यवाद

 

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