Digendra Kumar

Kargil Hero Digendra Kumar

26 जुलाई 1999 को करगिल युद्ध में भारत के करीब 500 जवान शहीद हुए। लेकिन उनकी वीरता की कहानियां आज भी सुनाई जाती हैं। इन्हीं जवानों में से एक रिटायर्ड फौजी दिगेंद्र सिंह भी हैं।ऑपरेशन विजय के जरिए भारत ने पाकिस्तान को करारा जवाब दिया था। 26 जुलाई 1999 को करगिल युद्ध में भारत के करीब 500 जवान शहीद हुए। लेकिन उनकी वीरता की कहानियां आज भी सुनाई जाती हैं। इन्हीं जवानों में से एक रिटायर्ड फौजी दिगेंद्र सिंह भी हैं।

Digendra Kumar

उन्होंने करगिल युद्ध के समय जम्मू कश्मीर में तोलोलिंग पहाड़ी की बर्फीली चोटी को मुक्त करवाकर 13 जून 1999 की सुबह चार बजे तिरंगा लहराते हुए भारत को पहली जीत दिलाई, जिसके लिए उन्हें उन्होंने करगिल युद्ध के समय जम्मू कश्मीर में तोलोलिंग पहाड़ी की बर्फीली चोटी को मुक्त करवाकर 13 जून 1999 की सुबह चार बजे तिरंगा लहराते हुए भारत को पहली जीत दिलाई, जिसके लिए उन्हें भारत सरकार द्वारा 15 अगस्त 1999 को महावीर चक्र से नवाजा गया। भारत सरकार द्वारा 15 अगस्त 1999 को महावीर चक्र से नवाजा गया।

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3 जुलाई 1969 को राजस्थान के सीकर जिले में जन्में दिगेंद्र कुमार 3 सितंबर 1985 को राजपुताना राइफल्स की दूसरी बटालियन में शामिल हुए

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पाकिस्तानी सेना ने ऊपर चोटी पर 11 बंकर बनाए थे। पहाड़ियों पर पड़ी बर्फ से ऊपर चढ़ना और भी मुश्किल था। दिगेद्र अपने साथियों के साथ दुश्मन के पास तक पहुंचे। उन्होंने दुश्मन के बंकर में एक हथगोला फेंका। जोर से धमाका हुआ तो अंदर से आवाज आई, अल्हा हो अकबर। काफिर का हमला। दिगेन्द्र की वजह से दुश्मन का पहला बंकर राख हो चुका था। हालांकि इसके बाद आपसी फाइरिंग तेज हो गई। दिगेन्द्र बुरी तरह जख्मी हो गए थे।

दिगेंद्र कुमार

फायरिंग में दिगेंद्र के सीने में तीन गोलियां लगीं। कुल 5 गोलियां लगी। दिगेंद्र के सीने में 3, हाथ व पैर में एक-एक गोली लगी थी एक पैर बुरी तरह जख्मी हो गया था। दिगेन्द्र ने हिम्मत नहीं हारी। बहते हुए खून को रोका। दिगेन्द्र ने अकेले ही 11 बंकरों में 18 हथगोले फेंके और उन्होंने सारे पाकिस्तानी बंकरों को नष्ट कर दिया।इसी दौरान दिगेन्द्र को पाकिस्तानी मेजर अनवर खान नजर आया। झपट्टा मार कर अनवर पर कूद पड़े और उसका सिर काट दिया और 48 दुश्मनों को मारते हुए तिरंगा फहराकर देश की पहली विजय का जयघोष किया।

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दुश्मनों से 14 घंटें संघर्ष में पांच गोलियां लगने के बाद भी दिगेन्द्र ने हिम्मत नहीं हारी और दुश्मनों से लोहा लेते हुए करगिल की जीत दिलाई। करगिल युद्ध में दिगेन्द्र के दो भाई मानसिंह व भूपसिंह ने भी अपना कर्तव्य निभाया। दिगेन्द्र कहते हैं कि युवाओं को कुछ ऐसा करना चाहिए जिससे गांव, क्षेत्र तथा देश का नाम पूरी दुनियां में गूंजे। युवा देश हित में सर्वस्व अर्पित करने को तत्पर रहे।

47 वर्षीय दिगेंद्र सिंह 31 जुलाई, 2005 को रिटायर हो चुके हैं, मगर खुद को अब भी युद्ध लडऩे के काबिल मानते हैं। दिगेंद्र को इंडियन आर्मी को बेस्ट कमांडो के रूप में भी जाना जाता है।

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