Khatarua

Khatarua- उत्तराखंड को देवभूमि के नाम से जाना जाता है और हर महीने देवभूमि में कोई ना कोई लोक पर्व जरूर बनाया जाता है ऐसा ही एक पर्व है खतड़वा यह त्यौहार वर्षा ऋतु के समाप्त होने तथा शरद ऋतु के प्रारंभ में यानी आश्विन माह के प्रथम दिन मनाया जाने वाला त्यौहार है खतड़वा (Khatarua) शब्द की उत्पत्ति “खातड़” या “खातड़ि” शब्द से हुई है, जिसका अर्थ है रजाई या अन्य गरम कपड़े. क्योंकि सितंबर के महीने में उत्तराखंड के पहाड़ी इलाकों में हल्की हल्की ठंड पड़नी शुरू हो जाती है.

उत्तराखंड में Khatarua त्यौहार सिर्फ कुमाऊं में ही बनाया जाता है इसे गाईत्यार या गौ त्यार भी बोला जाता है यह त्यौहार गायों को समर्पित होता है. इस दिन गायों की पूजा की जाती है. क्योंकि किसान की सबसे अमूल्य संपत्ति उसकी  भूमि या उसका पशु ही होता है. इस त्यौहार के दिन गांवों में लोग अपने पशुओं के गोठ (गौशाला) को विशेष रूप से साफ करते हैं. उत्तराखंड में प्रकृति और पशुओं से संबंधित बहुत त्योहार मनाए जाते हैं जैसे कि इससे पहले हम आपको हरेला और घी सक्रांति जैसे प्रकृति प्रेमी त्योहारों के बारे में बता चुके हैं.

Khatarua खतड़वा कैसे मनाया जाता है?

Khatarua Festival इस त्यौहार के दिन कांस के पौधों को फूल सहित काटकर लाया जाता है. भांग के डंठल को काटकर उसमे घास, फूस व पिरोल तथा चीड़ के छिलको को एक साथ बांध कर उसे एक पुतले का रूप दे देते हैं. जिसे खतड़वा (एक छोटी मशाल) कहते हैं.इस तरह के दो पुतले बनाये जाते है जिसे बूढ़ा बुढ़िया कहा जाता है. खतड़वा Khatarua को जानवरों के रहने की जगह के आसपास ही बनाए जाता हैं. अब खतड़वा बन कर तैयार है

Khatarua खतड़वा

फिर शाम को पूरे गौशाला के अन्दर इस मशाल (खतड़ुवा) को जलाकर घुमाया जाता है और भगवान से कामना की जाती है कि वो इन पशुओं को दुख-बीमारी से सदैव दूर रखें. गांव के बच्चे गौशाला के पास चौराहे पर जलाने लायक लकड़ियों और पिरोल का एक बड़ा ढेर लगाते हैं गौशाला के अन्दर से मशाल लेकर ,चौराहे पर पहुंचते हैं और इस लकड़ियों के ढेर में “खतड़ुआ” समर्पित किये जाते हैं.

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कांस के पौधे

वही जलती हुए अग्नि में ककड़ी (खीरा ),अखरोट भी चढ़ाया जाता है. अंत में अग्नि के शांत हो जाने के बाद खतड़वे की राख को सभी लोग अपने – अपने माथे पर लगाते हैं या अग्नि के आर पार कूदते है तथा साथ ही साथ यही राख सभी पशुओं के माथे पर भी लगाई जाती है.इस अवसर पर एक सुंदर लोक गीत भी गाया जाता है.

भैल्लो जी भैल्लो, भैल्लो खतडुवा,
गै की जीत, खतडुवै की हार
भाग खतड़ुवा भाग

अर्थात गाय की जीत हो और खतड़ुआ (पशुधन को लगने वाली बिमारियों) की हार हो.

ऐसा माना जाता है कि इस जलते हुए खतड़वे के साथ साथ उनके पशुओं के सारे रोग भी खत्म हो जाते है और इस समय पर पर्वती क्षेत्र में बहुत अधिक मात्रा में होने वाली ककड़ी (खीरा ),अखरोट को प्रसाद स्वरूप वितरण किया जाता है.

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Khatarua इस उत्सव की एक प्रचलित कथा

एक मान्यता के अनुसार कुछ लोग इस लोकपर्व को एक विजयोत्सव पर्व भी मनाते हैं.कहा जाता है कि कुमाऊ सेना के गैडा़ सिंह ने गढ़वाली सेना के अपने प्रतिद्वंदी खतड़ सिंह (खतड़ुवा) को हराया था. उसके बाद यह त्यौहार शुरू हुआ. लेकिन इस काल्पनिक युद्ध की घटना का उल्लेख गढवाल या कुमाऊं के किसी ऐतिहासिक वर्णन में नही है.
कुछ लोग इस लोकगीत को भी गाते है

गैड़ा की जीत, खतड़ुवा की हार
भाजी खतड़ुवा धारो धार
या गड़ा पड़ो स्योव ,खतड़ुवा हुआ पड़ो भ्योय

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