विशेष संवाददाता | नई दिल्ली
वैश्विक स्तर पर जलवायु परिवर्तन, गहराते भू-राजनीतिक संघर्षों और आपूर्ति श्रृंखला (Supply Chain) के टूटने से दुनिया के सामने एक गंभीर खाद्यान्न संकट का खतरा मंडरा रहा है। मध्य पूर्व के तनाव, लाल सागर में हमलों और रूस-यूक्रेन युद्ध के कारण वैश्विक कृषि व्यापार बुरी तरह प्रभावित हुआ है। दुनिया के कई देश खाद्यान्न की कमी और बेकाबू खाद्य मुद्रास्फीति से जूझ रहे हैं।
ऐसे में 140 करोड़ से अधिक आबादी वाले भारत के लिए यह स्थिति राष्ट्रीय सुरक्षा और सामाजिक स्थिरता से जुड़ी है। बड़ा सवाल यह है कि क्या वैश्विक खाद्य संकट के बीच भारत की खाद्य सुरक्षा प्रणाली इतनी मजबूत है कि वह इस झटके को सह सके? आइए जानते हैं इस रिपोर्ट में।
मजबूत बफर स्टॉक और FCI का सुरक्षा कवच
भारत की खाद्य सुरक्षा का सबसे मजबूत ढांचा देश का राष्ट्रीय खाद्यान्न भंडार (Buffer Stock) और भारतीय खाद्य निगम (FCI) की प्रबंधन प्रणाली है।
- सुरक्षित भंडार: सरकारी आंकड़ों के अनुसार, भारत के पास वर्तमान में लगभग 550 लाख मीट्रिक टन से अधिक खाद्यान्न का सुरक्षित भंडार मौजूद है।
- चावल का मजबूत स्टॉक: देश में चावल का स्टॉक तय सीमा से लगभग दोगुना है।
- आपातकालीन स्थिति से मुकाबला: यह भारी-भरकम भंडार किसी भी आपात स्थिति या मानसूनी असफलता के समय देश की आबादी को सुरक्षा प्रदान करने के लिए एक अभेद्य कवच है।
दलहन, तिलहन और पीएम गरीब कल्याण अन्न योजना
केवल गेहूं और चावल पर निर्भर रहने के बजाय भारत सरकार ने भविष्य की जरूरतों को देखते हुए कई बड़े कदम उठाए हैं:
- आत्मनिर्भरता की ओर कदम: भारत अपनी खाद्य तेलों की जरूरत का 50% से 55% हिस्सा आयात करता है। इसे देखते हुए राष्ट्रीय खाद्य तेल-पाम ऑयल मिशन और ‘पीली क्रांति 2.0’ के तहत घरेलू तिलहन उत्पादन को तेजी से बढ़ावा दिया जा रहा है।
- दलहन उत्पादन को प्रोत्साहन: किसानों को दलहन की खेती के लिए प्रोत्साहित करने हेतु चना, अरहर और उड़द के न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) में लगातार वृद्धि की गई है।
- मुफ्त राशन योजना: प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना (PMGKAY) के तहत देश के लगभग 80 करोड़ नागरिकों को मुफ्त खाद्यान्न मिल रहा है, जो वैश्विक महंगाई और आसमान छूती कीमतों के बीच गरीबों के लिए ढाल बना हुआ है।
- निर्यात पर रणनीतिक प्रतिबंध: घरेलू बाजार में उपलब्धता बनाए रखने के लिए गैर-बासमती चावल और गेहूं के निर्यात पर कड़े प्रतिबंध लगाए गए हैं। सरकार का रुख साफ है कि घरेलू नागरिकों की खाद्य सुरक्षा उसकी सर्वोच्च प्राथमिकता है।
चुनौतियाँ और भविष्य की राह
हालांकि भारत की स्थिति मजबूत है, लेकिन रिपोर्ट कुछ गंभीर चुनौतियों की ओर भी इशारा करती है:
- भंडारण क्षमता की कमी: आधुनिक साइलो (Silos) और कोल्ड चेन इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी के कारण आज भी हर साल हजारों टन अनाज खराब हो जाता है।
- जलवायु परिवर्तन का खतरा: भूजल का अत्यधिक दोहन, अचानक पड़ने वाली भीषण गर्मी और बेमौसम बारिश फसलों के लिए लगातार चिंता का विषय बनी हुई है।
निष्कर्ष
वैश्विक खाद्य संकट के काले बादलों के बीच भारत की स्थिति दुनिया के अन्य देशों की तुलना में बेहद मजबूत और सुरक्षित है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ‘फर्टिलाइजर डिप्लोमेसी’, रबी सीजन की ठोस जमीनी तैयारी और विशाल अन्न भंडार के बूते भारत ने यह साबित कर दिया है कि वह वैश्विक खाद्य संकट के मुहाने पर भी एक आत्मनिर्भर और सुरक्षित राष्ट्र के रूप में खड़ा है।
